डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा, बाजार में बढ़ी हलचल
भारतीय मुद्रा बाजार में शुक्रवार को बड़ी हलचल देखने को मिली। शुरुआती कारोबार में डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा और 36 पैसे कमजोर होकर 94.58 के स्तर पर पहुंच गया। पिछले दो दिनों से मजबूत हो रहा रुपया एक बार फिर दबाव में आ गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है।
हाल ही में रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर 95.4325 तक पहुंच गया था। हालांकि उसके बाद दो कारोबारी सत्रों में इसमें 1 प्रतिशत से ज्यादा की मजबूती देखने को मिली थी। लेकिन शुक्रवार को फिर से डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर की मजबूती और तेल कंपनियों की बढ़ती डॉलर मांग भारतीय मुद्रा को कमजोर कर रही है। इसके अलावा वैश्विक निवेशक भी फिलहाल सतर्क नजर आ रहे हैं।
अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ीं तेल कीमतें
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर सीधे कच्चे तेल के बाजार पर पड़ा है। इसी वजह से डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा और भारतीय बाजार में दबाव बढ़ गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने अमेरिका पर संघर्ष विराम तोड़ने का आरोप लगाया है, जबकि अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई करने की बात कही है। इस तनाव के बाद वैश्विक तेल बाजार में फिर तेजी आ गई है।
ब्रेंट क्रूड की कीमतें गुरुवार को 96 डॉलर तक नीचे आ गई थीं, लेकिन अब फिर बढ़कर 101.50 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो तेल कंपनियों को ज्यादा डॉलर खरीदने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और भारतीय मुद्रा कमजोर होती है। यही कारण है कि शुक्रवार को फिर डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा और बाजार में अस्थिरता बढ़ गई।
RBI के कदमों का सीमित असर, आगे भी रह सकता है दबाव
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार की ओर से रुपये को स्थिर रखने के लिए कई उपाय किए गए हैं, लेकिन फिलहाल उनका असर सीमित दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से स्थिति पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकती।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार रुपये की चाल अब काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात पर निर्भर करेगी। यदि तेल की कीमतों में स्थिरता आती है और अंतरराष्ट्रीय तनाव कम होता है, तो भारतीय मुद्रा को कुछ राहत मिल सकती है।
इसके अलावा तेल आयात करने वाली कंपनियां लगातार डॉलर खरीद रही हैं, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव बना हुआ है। कई आयातकों ने जोखिम कम करने के लिए हेजिंग गतिविधियां भी बढ़ा दी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम नहीं हुआ, तो भारतीय मुद्रा पर और दबाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल बाजार की नजर पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और तेल कीमतों पर बनी हुई है। ऐसे हालात में निवेशकों और कारोबारियों के बीच चिंता बढ़ गई है क्योंकि लगातार डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा तो इसका असर महंगाई और आयात लागत पर भी पड़ सकता है।








