Laalo Review: 25 लाख की गुजराती फिल्म जिसने 100 करोड़ का इतिहास रचा, हिंदी सिनेमा के लिए सबक

Laalo Review: हिंदी सिनेमा में अक्सर यह बहस होती रहती है कि अच्छे कंटेंट वाली फिल्में क्यों नहीं बन रहीं, क्यों बजट बढ़ता जा रहा है लेकिन आत्मा गायब होती जा रही है। इसी सवाल का करारा जवाब बनकर सामने आई है गुजराती फिल्म Laalo, जो अब हिंदी में डब होकर रिलीज हो चुकी है। Laalo Review: महज 25 लाख रुपये के मामूली बजट में बनी इस फिल्म ने गुजराती भाषा में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार कर लिया है। यह सिर्फ एक फिल्म की सफलता नहीं, बल्कि सोच और सिनेमा की समझ की जीत है।

Laalo Review: कम बजट, बड़ा कमाल

आज के दौर में जहां करोड़ों के बजट के बिना फिल्म की कल्पना तक नहीं की जाती, वहीं लालो जैसी फिल्म यह साबित करती है कि सिनेमा पैसे से नहीं, विजन से बनता है। बताया जाता है कि इस फिल्म का बजट 25 लाख रुपये था, वो भी पूरे जुगाड़ और संघर्ष के साथ जुटाया गया। Laalo Review: न बड़े सेट, न महंगे कैमरे, न स्टारकास्ट—इसके बावजूद फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा धमाका किया कि पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

यही वजह है कि अब जब यह फिल्म हिंदी में रिलीज हुई है, तो बॉलीवुड के बड़े फिल्ममेकर्स—खासतौर पर जुहू, बांद्रा और बोरीवली के चमकते स्टूडियो—को इस टीम को बुलाकर यह सीखना चाहिए कि असली सिनेमा कैसे बनाया जाता है।

Laalo Review: कहानी जो सवाल पूछती है

लालो की कहानी एक आम ऑटो ड्राइवर के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक सुनसान जगह पर एक घर में फंस जाता है। न खाना, न पानी, न बाहर निकलने का कोई रास्ता। घर पर उसकी पत्नी और बेटी उसकी राह देख रही होती हैं, परेशान हैं, टूट रही हैं। इसी कैद और मजबूरी के बीच नायक के मन में एक बुनियादी सवाल जन्म लेता है—क्या सच में भगवान होते हैं? अगर होते हैं तो मुसीबत में मदद क्यों नहीं करते?

फिल्म इसी सवाल का जवाब तलाशती है, वो भी बिना उपदेश दिए। कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, लेकिन हर सीन आपको अपने साथ बांधे रखता है। शायद इसलिए क्योंकि यह सवाल हर इंसान ने कभी न कभी खुद से पूछा है।

Laalo Review: कैसी है फिल्म

लालो उन दुर्लभ फिल्मों में से है जो एक पल के लिए भी दर्शक का कनेक्शन नहीं टूटने देती। अगर सिनेमा आपको कुछ सिखा सकता है, आपको महसूस करा सकता है, आपको आईना दिखा सकता है—तो यही सिनेमा है। यहां कोई जबरदस्ती का इमोशन नहीं है। Laalo Review: न हंसाने की ओवरएक्टिंग, न रुलाने का मेलोड्रामा। सब कुछ अपने आप होता है, बिल्कुल जिंदगी की तरह।

फिल्म देखकर यकीन करना मुश्किल होता है कि इतनी सधी हुई, इतनी पावरफुल फिल्म सिर्फ 25 लाख में बन सकती है। यह फिल्म सिखाती है कि विजन बड़ा होना चाहिए, सिनेमा की समझ होनी चाहिए और सिनेमा से सच्चा प्यार होना चाहिए—बाकी रास्ते खुद बन जाते हैं।

Laalo Review: दमदार अभिनय

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी एक्टिंग है। Reeva Rach ने पत्नी के किरदार में कमाल का संतुलन दिखाया है। पति से नाराज़गी, फिर उसके गायब होने की बेचैनी—दोनों भाव उन्होंने बेहद सच्चाई से निभाए हैं।

Karan Joshi ने लालो के किरदार में जान डाल दी है। यह जानकर हैरानी होती है कि वह नए एक्टर हैं। फर्श पर गिरे पानी को पीने वाला सीन उनकी एक्टिंग रेंज का सबसे बड़ा सबूत है—वो सीन सिर्फ देखा नहीं जाता, महसूस किया जाता है।

वहीं Shruhad Goswami अपने किरदार में इतने प्रभावशाली हैं कि दर्शक अनायास ही उनके प्रति श्रद्धा महसूस करने लगता है।

Laalo Review: राइटिंग और डायरेक्शन की जीत

फिल्म की कहानी Krishnansh Vaja, Vicky Purnima और Ankit Sakhia ने लिखी है। राइटिंग इस फिल्म की जान है। हर डायलॉग, हर सीन सोच-समझकर रखा गया है। यह फिल्म एक बार फिर साबित करती है कि राइटर ही सिनेमा की नींव होता है।

डायरेक्शन की कमान संभालने वाले अंकित सखिया ने सीमित संसाधनों में भी ऐसा संसार रचा है, जो लंबे समय तक याद रहता है। उनकी निर्देशन शैली सादी है, लेकिन बेहद प्रभावशाली। https://www.bollywood.com/

निष्कर्ष

लालो सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सीख है—हर सिनेमा लवर और हर फिल्ममेकर के लिए। यह फिल्म बताती है कि हम कहां भटक गए हैं और सिनेमा असल में क्या हो सकता है। अगर आप सिनेमा से प्यार करते हैं, अगर आप फिल्मों को सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं बल्कि अनुभव मानते हैं, तो यह फिल्म हर हाल में देखिए। यही असली सिनेमा है। https://publichint.com/tilak-varma-injury-update/

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