Friday, 22 May 2026
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CBSE के नए नियम से मचा हड़कंप! छात्रों के भविष्य को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

CBSE की नई भाषा नीति पर बढ़ा विवाद, छात्रों और अभिभावकों में चिंता

CBSE केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE की नई तीन-भाषा नीति को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। नई व्यवस्था के तहत वर्ष 2026-27 से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया जाएगा। बोर्ड का कहना है कि इन तीन भाषाओं में कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना जरूरी होगा। हालांकि, इस फैसले ने छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच चिंता बढ़ा दी है। अब इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दाखिल की गई है।

क्या है CBSE की नई भाषा नीति?

CBSE द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, 2026-27 सत्र से कक्षा 9 के विद्यार्थियों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। इसमें दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य होंगी। यदि कोई छात्र फ्रेंच, जर्मन या अन्य विदेशी भाषा पढ़ना चाहता है, तो उसे चौथी या अतिरिक्त भाषा के रूप में ही चुना जा सकेगा।

बोर्ड का कहना है कि यह फैसला नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF-SE 2023) के तहत लिया गया है। CBSE सरकार और बोर्ड का मानना है कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने और छात्रों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए यह कदम जरूरी है।

CBSE सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

नई नीति के खिलाफ दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई के कई अभिभावकों और शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। CBSE याचिकाकर्ताओं का कहना है कि छात्रों पर अचानक नई भाषा थोपना उचित नहीं है।

उनका तर्क है कि कई छात्र पिछले कई वर्षों से विदेशी भाषाएं पढ़ रहे हैं और अब बीच में भाषा बदलने से उनकी पढ़ाई और करियर दोनों प्रभावित हो सकते हैं। खासकर कक्षा 9 और 10 बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। ऐसे में नई भाषा जोड़ना छात्रों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।

CBSE पर वादा बदलने का आरोप

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि अप्रैल 2026 में CBSE ने संकेत दिया था कि यह नई व्यवस्था 2029-30 सत्र से लागू की जाएगी। इसी आधार पर स्कूलों और परिवारों ने अपनी योजनाएं बनाई थीं।

लेकिन मई 2026 में जारी नए सर्कुलर में कहा गया कि यह नियम जुलाई 2026 से लागू होगा। CBSE अचानक फैसले में बदलाव से अभिभावकों और स्कूलों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इतने कम समय में छात्रों को नई भाषा के लिए तैयार करना व्यावहारिक नहीं है।

CBSE शिक्षकों और संसाधनों की कमी

नई नीति को लेकर एक बड़ी चिंता शिक्षकों और अध्ययन सामग्री की उपलब्धता को लेकर भी सामने आई है। CBSE कई स्कूलों में नई भाषाओं के लिए प्रशिक्षित शिक्षक मौजूद नहीं हैं।

कुछ स्कूलों में दूसरे विषय पढ़ाने वाले शिक्षकों से भाषा पढ़ाने की बात कही जा रही है। CBSE इसके अलावा कई जगहों पर किताबों और अन्य अध्ययन सामग्री की भी कमी बताई जा रही है।

अभिभावकों का कहना है कि बिना पर्याप्त तैयारी और संसाधनों के नई व्यवस्था लागू करने से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है।

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CBSE विदेशी भाषा शिक्षकों पर भी संकट

नई नीति का असर विदेशी भाषाएं पढ़ाने वाले शिक्षकों और संस्थानों पर भी पड़ सकता है। यदि फ्रेंच, जर्मन और अन्य विदेशी भाषाएं मुख्य तीन-भाषा प्रणाली से बाहर हो जाती हैं, तो इन भाषाओं के शिक्षकों की मांग कम हो सकती है।

याचिकाकर्ताओं ने चिंता जताई है कि इससे हजारों शिक्षकों और प्रशिक्षण संस्थानों के रोजगार पर असर पड़ सकता है।

CBSE छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ने की आशंका

अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि कक्षा 9 और 10 पहले से ही छात्रों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होती हैं। इसी दौरान बोर्ड परीक्षा की नींव तैयार होती है।

ऐसे समय में नई भाषा जोड़ने से छात्रों पर मानसिक और शैक्षणिक दबाव बढ़ सकता है। CBSE कई छात्रों को पहले से ही विज्ञान, गणित और अन्य विषयों के कारण तनाव का सामना करना पड़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि नई शिक्षा नीति में छात्रों को विकल्प और लचीलापन देने की बात कही गई थी, लेकिन मौजूदा फैसला उसी भावना के खिलाफ नजर आता है।

CBSE शिक्षा विशेषज्ञों की मिली-जुली राय

कुछ शिक्षा विशेषज्ञ इस नीति का समर्थन कर रहे हैं। उनका कहना है कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना जरूरी है और छात्रों को अपनी मातृभाषा और देश की अन्य भाषाओं से जोड़ना सकारात्मक कदम हो सकता है।

वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े बदलाव को लागू करने से पहले पर्याप्त तैयारी और चरणबद्ध योजना जरूरी होती है। CBSE उनका कहना है कि छात्रों को अचानक नई व्यवस्था में ढालना उचित नहीं होगा।

CBSE अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजर

फिलहाल इस पूरे मामले पर सभी की नजर सुप्रीम Court की सुनवाई पर टिकी हुई है। यदि अदालत इस नीति पर अंतरिम रोक लगाती है, तो CBSE को अपने फैसले पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। https://www.cbse.gov.in/

वहीं यदि कोर्ट बोर्ड के फैसले को सही ठहराता है, तो आने वाले समय में देशभर के लाखों छात्रों को नई भाषा व्यवस्था के तहत पढ़ाई करनी होगी।

नई भाषा नीति ने शिक्षा व्यवस्था, छात्रों के भविष्य और भाषा संतुलन को लेकर देशभर में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। CBSE अब देखना होगा कि इस विवाद का समाधान किस दिशा में जाता है।

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