Rupee at Record Low से बढ़ी आर्थिक चिंता
भारतीय रुपया एक बार फिर चर्चा में है क्योंकि Rupee at Record Low की स्थिति ने सरकार और आर्थिक विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। मंगलवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.75 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंच गया। कारोबार खत्म होने तक रुपया 95.63 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो अब तक का सबसे कमजोर क्लोजिंग स्तर माना जा रहा है।
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, विदेशी निवेश की निकासी और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता के कारण Rupee at Record Low की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है।
CEA ने Rupee at Record Low पर जताई चिंता
मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी अनंता नागेश्वरन ने कहा कि Rupee at Record Low को और नीचे जाने से रोकना सरकार की सबसे बड़ी आर्थिक प्राथमिकताओं में शामिल है।
नई दिल्ली में आयोजित CII बिजनेस समिट में उन्होंने कहा कि भारत को चालू खाते (Current Account) को संतुलित रखना होगा और रुपये में आगे की गिरावट को रोकने के लिए मजबूत कदम उठाने होंगे।
उन्होंने यह भी साफ किया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में जो बदलाव हो रहे हैं, वे अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी हैं।
West Asia War बना बड़ा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का सबसे बड़ा असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर पड़ा है। युद्ध शुरू होने के बाद से Rupee at Record Low की स्थिति लगातार खराब होती गई है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आने से भारत का आयात बिल बढ़ गया है। इसके अलावा सोना और उर्वरकों की बढ़ती कीमतों ने भी विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है।
Foreign Investors ने निकाला अरबों डॉलर
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय बाजारों से करीब 23 अरब डॉलर निकाल लिए हैं। इससे शेयर बाजार और रुपये दोनों पर दबाव बढ़ा है।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि लगातार विदेशी निवेश निकलने से Rupee at Record Low की समस्या और गंभीर हो सकती है।
Current Account Deficit बढ़ने का खतरा
अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि भारत का Current Account Deficit (CAD) GDP के 2% से ऊपर जा सकता है। RBI पहले भी संकेत दे चुका है कि लंबे समय तक इतना बड़ा घाटा संभालना मुश्किल हो सकता है।
कमजोर निर्यात, बढ़ता आयात और कम विदेशी निवेश भारत की आर्थिक चुनौतियों को और बढ़ा रहे हैं। यही कारण है कि Rupee at Record Low अब केवल मुद्रा बाजार की खबर नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन चुका है।
PM मोदी की अपील का असर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में लोगों से गैर-जरूरी विदेशी यात्रा, सोने की खरीदारी और आयात आधारित खर्च कम करने की अपील की थी।
सरकार का मानना है कि अगर लोग विदेशी खर्च कम करेंगे तो इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटेगा और Rupee at Record Low जैसी स्थिति को संभालने में मदद मिलेगी।
तेल कंपनियों पर भारी दबाव
सरकार ने फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की है, लेकिन इसका बोझ सरकारी तेल कंपनियों पर पड़ रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक अप्रैल-जून तिमाही में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को लगभग 1 लाख करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है। इससे आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थायी बदलाव
CEA नागेश्वरन ने कहा कि दुनिया चार बड़े आर्थिक बदलावों से गुजर रही है:
- व्यापार युद्ध और आर्थिक विभाजन
- टेक्नोलॉजी में वैश्विक प्रतिस्पर्धा
- ऊर्जा क्षेत्र में महंगी ट्रांजिशन लागत
- बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव
उन्होंने कहा कि Emerging Economies को अब नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के हिसाब से खुद को तैयार करना होगा।
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