Delayed Flat Possession Refund: घर खरीदने का सपना लेकर निवेश करने वाले दो खरीदारों को आखिरकार 15 साल लंबे इंतजार के बाद राहत मिली है। दिल्ली उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Delhi Consumer Disputes Redressal Commission) ने दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसाइटी Nest Sahkari Awas Samiti Ltd को आदेश दिया है कि वह दोनों खरीदारों को ₹80 लाख से अधिक की राशि वापस करे। आयोग ने परियोजना में अत्यधिक देरी और फ्लैट का कब्जा न देने को सेवा में गंभीर कमी माना है।
आयोग की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति संगीता धींगरा सहगल (अध्यक्ष) और सदस्य बिमला कुमारी शामिल थीं, ने कहा कि सोसाइटी 15 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद फ्लैट का कब्जा देने में विफल रही। इस कारण खरीदारों को मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न झेलना पड़ा।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला प्रमोद कुमार महापात्रा और महेंद्र सिंह बिष्ट नामक दो खरीदारों से जुड़ा है। दोनों ने वर्ष 2010 में नोएडा के सेक्टर-62 स्थित एक आवासीय परियोजना में 3BHK फ्लैट के लिए आवेदन किया था। परियोजना को Nest Sahkari Awas Samiti Ltd द्वारा लॉन्च किया गया था।
सोसाइटी ने उस समय खरीदारों को आश्वासन दिया था कि फ्लैट का कब्जा वर्ष 2012 तक दे दिया जाएगा। इसके लिए क्रमशः लगभग ₹24 लाख और ₹26.60 लाख की कीमत तय की गई थी।
नोएडा से गाजियाबाद शिफ्ट हुई परियोजना
बाद में मूल परियोजना की जमीन से जुड़े विवाद सामने आए। आरोप है कि सोसाइटी ने खरीदारों और अन्य सदस्यों को अपनी बुकिंग गाजियाबाद स्थित Palm Wood Enclave, Wave City, NH-24 परियोजना में स्थानांतरित करने के लिए मजबूर किया।
सोसाइटी ने नई परियोजना में फ्लैट की कीमत बढ़ाकर लगभग ₹28.78 लाख कर दी। खरीदारों ने यह प्रस्ताव इस भरोसे पर स्वीकार किया कि पहले जमा की गई राशि को नई परियोजना में समायोजित कर दिया जाएगा।
बढ़ती गई कीमत, नहीं मिला फ्लैट
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, सोसाइटी ने समय-समय पर पार्किंग शुल्क, एस्केलेशन कॉस्ट, जीएसटी, सर्विस टैक्स, मैकेनिकल वेंटिलेशन शुल्क और अन्य मदों के नाम पर अतिरिक्त रकम वसूल की।
इन अतिरिक्त मांगों को पूरा करने के लिए खरीदारों को होम लोन और टॉप-अप लोन तक लेना पड़ा। इसके बावजूद उन्हें वर्षों तक फ्लैट का कब्जा नहीं मिला।
हालांकि वर्ष 2019 में फ्लैट आवंटित कर दिए गए, लेकिन आयोग के समक्ष यह आरोप लगाया गया कि आवंटन केवल कागजों तक सीमित रहा और आज तक वास्तविक कब्जा नहीं दिया गया।
आयोग ने क्या कहा?
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि खरीदारों ने समझौते के अनुसार समय पर भुगतान किया और अपनी सभी जिम्मेदारियां निभाईं। दूसरी ओर, सोसाइटी 42 से 48 महीनों की निर्धारित अवधि में फ्लैट का कब्जा देने में विफल रही।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि कोविड-19 महामारी का हवाला देकर देरी को उचित नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि परियोजना में देरी महामारी से कई वर्ष पहले शुरू हो चुकी थी।
₹80 लाख से अधिक रिफंड का आदेश
Delayed Flat Possession Refund मामले में आयोग ने दोनों खरीदारों को जमा की गई राशि लौटाने का आदेश दिया।
- शिकायतकर्ता प्रमोद कुमार महापात्रा को लगभग ₹39.08 लाख की वापसी।
- शिकायतकर्ता महेंद्र सिंह बिष्ट को लगभग ₹40.34 लाख की वापसी।
इसके अलावा आयोग ने दोनों को मानसिक उत्पीड़न और परेशानी के लिए कुल ₹4 लाख का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।
क्या सहकारी समिति भी उपभोक्ता कानून के दायरे में आती है?
सुनवाई के दौरान सोसाइटी की ओर से दलील दी गई कि वह कोई कमर्शियल बिल्डर नहीं बल्कि एक सहकारी आवास समिति है, इसलिए शिकायतकर्ता उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आते।
हालांकि आयोग ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सहकारी समिति भी “व्यक्ति” की परिभाषा में आती है और उसके द्वारा दी जाने वाली सेवाएं उपभोक्ता कानून के दायरे में आती हैं।
घर खरीदारों के लिए अहम फैसला
विशेषज्ञों का मानना है कि Delayed Flat Possession Refund मामले में आया यह फैसला उन लाखों घर खरीदारों के लिए महत्वपूर्ण है जो वर्षों से अपने फ्लैट के कब्जे का इंतजार कर रहे हैं।
यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि यदि कोई बिल्डर, डेवलपर या हाउसिंग सोसाइटी तय समय में कब्जा देने में विफल रहती है, तो खरीदारों को कानूनी राहत और रिफंड पाने का अधिकार है।https://confonet.nic.in
15 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आए इस फैसले को घर खरीदारों की बड़ी जीत माना जा रहा है।








