नई दिल्ली, 17 जून। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना के बाद खांसी की दवाओं (कफ सिरप) को लेकर लोगों के बीच कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब कफ सिरप खरीदने के लिए डॉक्टर की पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) अनिवार्य कर दी गई है? दरअसल, स्वास्थ्य मंत्रालय के नए फैसले के बाद नियमों में कुछ बदलाव जरूर हुए हैं, लेकिन हकीकत उतनी नहीं बदली जितनी लोगों को लग रही है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ड्रग रूल्स की शेड्यूल-K सूची से “सिरप” शब्द को हटा दिया है। इस कदम के पीछे हाल के वर्षों में सामने आए वे मामले हैं जिनमें दूषित (Contaminated) कफ सिरप पीने से कई बच्चों की मौत हुई थी। सरकार का उद्देश्य दवाओं की बिक्री और वितरण पर निगरानी बढ़ाना है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
क्या अब कफ सिरप खरीदने के लिए प्रिस्क्रिप्शन जरूरी होगा?
विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश कफ सिरप के लिए पहले से ही डॉक्टर की पर्ची जरूरी थी। नए आदेश से केवल वह छूट खत्म हुई है जिसके तहत 1,000 से कम आबादी वाले छोटे गांवों में स्थित सामान्य दुकानदार कुछ प्रकार के कफ सिरप बेच सकते थे।
अब ऐसे क्षेत्रों में भी कफ सिरप की बिक्री केवल लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोरों के माध्यम से ही हो सकेगी। हालांकि शहरी क्षेत्रों और बड़े कस्बों में पहले से यही व्यवस्था लागू थी।
सरकार ने यह कदम क्यों उठाया?
पिछले कुछ वर्षों में भारत और अन्य देशों में भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित कुछ कफ सिरप से जुड़े गंभीर मामले सामने आए थे। इनमें दवाओं में पाए गए जहरीले रसायनों के कारण कई बच्चों की मौत हुई थी।
विशेष रूप से मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में हुई घटना के बाद दवा नियामक संस्थाओं ने इस विषय पर गंभीर चर्चा शुरू की थी। जांच में पाया गया कि कई मामलों में दवाओं के निर्माण के दौरान इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट में मिलावट या गुणवत्ता संबंधी खामियां मौजूद थीं।
दूषित कफ सिरप कैसे बन जाते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार कफ सिरप बनाने में इस्तेमाल होने वाला प्रोपाइलीन ग्लाइकोल (PEG) या अन्य सॉल्वेंट उचित गुणवत्ता का नहीं होता। यदि गैर-फार्मास्युटिकल ग्रेड सामग्री का उपयोग किया जाए तो उसमें डाइएथिलीन ग्लाइकोल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकोल (EG) जैसे जहरीले तत्व मिल सकते हैं।
यही रसायन बच्चों और वयस्कों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
विशेषज्ञ क्या सुझाव दे रहे हैं?
दवा उद्योग और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बिक्री नियमों में बदलाव पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ निर्माण प्रक्रिया पर भी सख्त निगरानी जरूरी है।
विशेषज्ञों ने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
- कफ सिरप निर्माण में कम जोखिम वाले सॉल्वेंट का उपयोग किया जाए।
- जहां संभव हो, सिरप के बजाय सस्पेंशन आधारित दवाओं को बढ़ावा दिया जाए।
- छोटे निर्माताओं को प्रमाणित और ट्रैक किए जा सकने वाले सॉल्वेंट उपलब्ध कराए जाएं।
- दवा निर्माण इकाइयों का नियमित निरीक्षण किया जाए।
- सप्लाई चेन की निगरानी को मजबूत बनाया जाए।
आम लोगों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
डॉक्टरों का कहना है कि हर खांसी के लिए कफ सिरप लेना जरूरी नहीं होता। कई मामलों में खांसी अपने आप ठीक हो जाती है। बिना सलाह के बार-बार कफ सिरप लेने से असली बीमारी का पता लगाने में देरी भी हो सकती है।
विशेषज्ञ लोगों को सलाह देते हैं कि:
- केवल विश्वसनीय और स्थापित ब्रांड की दवाएं खरीदें।
- हमेशा लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर से ही दवा लें।
- बिना डॉक्टर की सलाह के बच्चों को कफ सिरप न दें।
- लंबे समय तक खांसी रहने पर स्वयं दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराएं।
- दवा की एक्सपायरी डेट और पैकेजिंग जरूर जांचें।
क्या बदलेगा आम लोगों के लिए?
नए नियम के बाद आम उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि छोटे गांवों की सामान्य दुकानों पर कफ सिरप की उपलब्धता कम हो सकती है। हालांकि डॉक्टर की पर्ची की आवश्यकता अधिकांश कफ सिरप के लिए पहले भी थी और अब भी बनी रहेगी।
सरकार का मानना है कि यह कदम दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने और बच्चों की सुरक्षा बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक सुधार तभी होगा जब निर्माण से लेकर बिक्री तक पूरी सप्लाई चेन की निगरानी और सख्त की जाएगी।https://www.mohfw.gov.in/








